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गन्ने की खेती

Hima Shankar K R
(Agri Expert), Jul 07 , 2020 11:52:38AMArticle by expert

भूमि का चुनाव:

गन्ने के लिए दोमट सबसे अच्छी भूमि है किन्तु भारी दोमट भूमि में भी गन्ने की अच्छी फसल हो सकती है। जल निकास का उचित प्रबन्ध होना चाहिए। जिस भूमि में पानी रूकता हो, वह गन्ने के लिए ठीक नहीं है। क्षारीय या अम्लीय भृमि भी गन्ने के योग्य नहीं समझी जाती है।

खेत की तैयारी: खेत को तैयार करने के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से जोतकर या तीन बार हेरा लगाना चाहिए। देशी हल की 5-6 जुताईयां काफी होती है। बुवाई के समय खेत में नमी होना आवश्यक है। जिस खेत में गन्ना लेना हो उसमें पिछले वर्ष गन्ने की फसल की रोगी फसल नहीं बोनी चाहिए।

प्रजातियाँ:अपने राज्य का शिफारिश की गयी किस्म का चयन करें 

बुवाई का समय:

(1) शरदकालीन बुवाई - 15 अक्टूबर तक होनी चाहिए।

(2) बसन्तकालीन बुवाई - 15 फरवरी से 15 मार्च तक होनी चाहिए।

बीज की तैयारी:

           जिस खेत में बीज का गन्ना लेना हो उसमें अच्छी तरह से खाद पड़ी हो। गन्ना निरोग हो, यदि गन्ने का केवल ऊपरी भाग बीज के काम में लाया जाये तो अधिक अंकुर निकलते हैं। गन्ने तीन आँख वाले टुकड़ों में काट लेना चाहिए। इस तरह 20,000 टुकड़े प्रति एकड़, के लिए काफी होंगे जिनका वजन लगभग 5-6 कुन्तल होगा (बीज दर अपनी राज्य कृषि के हिसाफसे पालन करें)। बोने से पहले बीज को पारायुक्त कार्बनिक कवकनाशी से उपचारित कर लें।

बुवाई:  बसन्त ऋतु में 75 सेमी. की दूरी पर तथा शरद ऋतु में 90 सेमी. की दूरी पर रिजर से 20 सेमी. गहरी नालियाँ खोदनी चाहिये। इसके बाद उर्वरक नालियों में डालकर मिट्टी में मिला देना चाहिये।

बुवाई की विधियाँ :

1. समतल विधि: इस विधि में 90 सेमी. के अन्तराल पर 7-10 सेमी. गहरा फॅड डेल्टा हल से बनाकर बोया जाता है।वस्तुतः यह विधि साधारण मृदा परिस्थितियों में उन कृषकों के लिए उपयुक्त है जिनके पास सिंचाई, खाद तथा श्रम के साधन सामान्य हो । बुवाई के उपरान्त एक भारी पाटा लगाना चाहिए।

2. नाली विधि: उस विधि में बुवाई के एक या डेढ़ माह पूर्व 90 सेंटीमीटर दूर और 20-25 सेंटीमीटर गहरी नालियां/कुंड बुआई के एक से डेढ़ माह पूर्व बनाएं। इन नालियों में गोबर की खाद डालें और सिंचाई देकर भूमि को तैयार करें। कुंडों में गन्ने के टुकड़े (गन्ने की पोरियाँ/बीज) रखने के बाद, 5 से.मी. मिट्टी के साथ ढक दें। यदि बुआई उचित नमी स्थितियों में नहीं किया गया है तो बुआई के तुरंत बाद सिंचाई करें। 4-5 दिनों के अंतराल पर सिंचाई दोहराएं। यह विधि दोमट भूमि के लिए उपयुक्त है।

3. दोहरी पंक्ति विधि (पेयरड रो ट्रेंच प्लांटिंग): सिंचाई के पानी की बचत के लिए इस विधि को अपनाएं। गन्ने की दो पंक्तियों को 30 सेंटीमीटर की दूरी पर 20-25 सेंटीमीटर गहरी कुंडों में लगाएं। गन्ने के टुकड़ों को कुंडों के नीचे रखें और दो पंक्तियों के बीच में छोड़ी गई मिट्टी से ढँक दें। दो खाइयों के बीच की दूरी 90 से.मी. होनी चाहिए। पानी की बचत के अलावा, यह विधि तुलनात्मक रूप से उच्च गन्ने की पैदावार देती है।

 

खाद :

मृदा परीक्षण संस्तुति के आधार पर खाद एवं उर्वरक का उपयोग करना चाहिए। गोबर की खाद 8 टन प्रति एकड़ कि दर से बुआई के 15 दिन पहले डाले।  

गन्ने के लिए 150-180 कि.ग्रा. नत्रजन, 75 कि.ग्रा. फास्फोरस, 75 कि.ग्रा. पोटाश, 25 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट व 20 कि.ग्रा. फेरस सल्फेट प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें। नत्रजन की एक तिहाई व फास्फोरस, पोटाश, जिंक सल्फेट एवं फेरस सल्फेट की सम्पूर्ण मात्रा बुआई के समय प्रयोग करें। फास्फोरस को एन.पी.के.(12-32-16) के द्वारा देना चाहिए जिससे पोटाश की आवश्यकता भी पूरी हो जाती है। नत्रजन की शेष तिहाई मात्रा को दो बार में बुवाई के 60 व 90 दिन पर देना चाहिए।

इसके साथ ही जैव उर्वरक जैसे एजोटोबैक्टर व फास्फोबैक्टीरिया उपलब्धता बढ़ाने वाला कल्चर (पी.एस.बी.) प्रत्येक की 300-400 मि.ली./ एकड़, मात्रा बुवाई के समय बीजउपचार या गोबर कि खाद से  प्रयोग करना चाहिए।

लोहा का कमी:

रेतीला और अधिक कैल्शियम युक्त मिटटी में बोई गई फसल में इसकी कमी का प्रभाव पेड़ी और नवीन फसलों में अधिक दिखाई देता है। कमी  नये पत्तों में दिखाई देते हैं,पूरी पत्ती में पीलापन आना, जिसके बाद हरी और पीली प्रत्यावर्ती धारियां, पत्ती की पूरी लंबाई तक विकसित होती दिखाई देने।

लोहे की कमी को दूर करने के लिए, 1.0 से 2.5 प्रतिशत फेरस सल्फेट को 0.1 प्रतिशत साइट्रिक एसिड के साथ मिलाकर तैयार घोल को हर सप्ताह तब तक स्प्रे करें, जब तक लक्षण खत्म न हो जायें। मृदा की आदर्श अवस्थाओं में 25-50 कि.ग्रा. फेरस  सल्फेट से मृदा के उपचार की सिफारिश की जाती है।

 सहफसल : गन्ने के दो पंक्तियों में  सिफारिश की गयी बसन्तकालीन मुंग,उर्द और लोबिया की अन्तराल फसल करने से अधिक अनाज 1.5 - 2 कुंतल / एकड़ पा सक्ते हैं।

 

सिंचाई : मैदानी इलाकों में शरद ऋतु में बोई गई फसल में 7 सिंचाईयाँ बरसात के पहले और 2 बरसात के बाद तथा बसन्त की फसल की 6 सिंचाईयाँ (4 वर्षा के पहले, 2 वर्षा के बाद) लगती हैं। एक सिंचाई कल्ले निकलते समय अवश्य लगानी चाहिए। तराई क्षेत्रों में सिंचाई केवल 2-3 बरसात के पहले पर्याप्त होती है तथा बरसात के बाद एक सिंचाई की आवश्यकता होगी।

खरपतवार नियंत्रण : 

1. यांत्रिक नियंत्रण : गन्ने के खेत को कस्सी/कुदाल/फावड़ा/कल्टीवेटर आदि 25-30 दिन से गुड़ाई करके खरपतवार नियंत्रित किया जा सकता है।

2. सूखी पत्ती बिछानाः : जमाव पूरा हो जाने के उपरान्त गन्ने की दो पंकित्यों के मध्य आठ से बारह सेमी. सूखी पत्तियों की तह बिछाना चाहिए।

3. रासायनिक नियंत्रण :

  • गन्ना बोने के तुरन्त बाद एट्राजीन (अटारी) @  400-600 ग्राम 200-280 लीटर पानी में घोलकर खरपतवारों के अनुसार छिड़कें।
  •  मेट्रीबुजीन 70% WP (तानोशी), 600ग्रा./एकड़ 200 ली. पानी में बुवाई के 25-30 दिन बाद छिड़कें।

फसल सुरक्षा :

बीज उपचार : बुवाई से पूर्व अपने बीज का उपचार पहले अपने क्षेत्र के चीनी मिल में उपस्थित नम गर्म वायु में 54  डिग्री के 4 घंटों का उपचार संयत्र के बाद यामाटो (कार्बोन्डाजिम) 200 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी के घोल में बीज को 10 मिनट तक उपचारित करके बोयें। 100 लीटर दवाई का घोल लगभग 30 कुन्तल बीज के टुकड़ों की उपचारित करने के लिए पर्याप्त हैं।

रोगों की रोकथाम :गन्ने की फसल में रोग बीज द्वारा फैलता है,अतः रोगों की रोकथाम हेतु निम्न तरीके अपनायें-

  • स्वस्थ एवं प्रमाणित बीज लें।
  • बीज के टुकड़े काटते समय लाल रंग, पीले रंग के एवं गांठों पर जड़ निकले तथा सूखे टुकड़ों का अलग कर दें।
  • बीज को ट्राइकोडर्मा (ट्राइको पवार प्लस) की 10 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर उपचारित करके बोयें।
  • बीज उपचार जरूर अपनाएं। 
  • रोग लगे खेत में 2-3 साल तक गन्ने की फसल न बोयें। 

रोग का नाम

आपतन काल

प्रमुख लक्षण

लाल सड़न रोग

वर्ष भर 

बीज के टुकड़े लाल रंग, पीले रंग के एवं गांठों पर जड़ निकले तथा सूखे  टुकड़े

काना रोग

 

जुलाई के अंत तक

1.अगोले के ऊपर से तीसरी व चौथी पत्ती के किनारे से गन्ना

सूखने लगता है।

2.तने को लंबवत चीरने पर गूदे का रंग लाल तथा इसमें

सफेद धब्बे दिखाई पड़ते है।

 

कण्डुआ (Smut)

 

वर्ष भर 

1.गन्ने अपेक्षाकृत पतले हो जाते हैं तथा तनेपर पतली व नुकीली पत्तियाँ एक ही गाँठ से विपरीत दिशाओं में निकलने लगती हैं।

2.रोग की अंतिम अवस्था में अग्रभाग की बढ़वार रूक जाती है

और लंबा कोढ़ा निकल जाता है।

3.गन्ने की निचली ऑखें समय से पूर्व अंकुरित हो जाती है।

 

उकठा (Wilt)

 

अक्टूबर से अंत तक

1. धीरे-धीरे गन्ने का पूरा अगोला सूख जाता है।

2. पूरा गन्ना खोखला हो जाता है।

3. लंबवत् चीरने पर खोखले भाग में भूरे रंग की फफूदी भरी

दिखाई देती है।

 

ग्रासी शूट रोग    

 

 

1.बहुत सारी दुबला कल्ली निकलते है

2.पत्तियां पूरी तरह से पतली और हल्के पीले हो जाते हैं

3.पौधे की वृद्धि के समय से पहले, लंबाई में कमी के कारण जंगली  घास जैसे  निरंतर दिखाई देते हैं।

 

रोग मुक्त कुंडों का बुआई करें

संक्रमित पौधों  को समय-समय पर निकालें और जलाएं।

समस्या क्षेत्रों में रगड़ से बचें

मलथियन या डाइमेथोएट @ 2 मिली / ली। का छिड़काव करके वेक्टर का नियंत्रण करें

लीफ स्काल्ड

अक्टूबर से अंत तक

1.अगोले की पत्तियाँ सूख कर सीधी हो जाती है तथा बाद में

धीरे-धीरे अगोला सूख जाता है।

2.नीचे से प्रारम्भ होकर क्रमशः ऊपर की सभी ऑखें समय से

अंकुरित हो जाती हैं और फिर निकले किल्ले सूख जाते

है।

3.तने के आंतरिक ऊतकों में लाल रंग की महीन धारियॉ पड़

जाती है, जो गाँठों पर अधिक सघन होती है

 

कीटों की रोकथाम:

गन्ने की प्रमुख नाशकीट, उनका आपतन काल एवं नियंत्रण :

नाशकीट

आपतन काल

नियन्त्रण के उपाय

दीमक (Termites)

 

वर्षभर

 इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एस.एल.(*इसोगाशी) 140 मिली को 750 लीटर पानी में घोलकर पंक्तियों में बुआई के समय छिड़काव करना चाहिए।

 क्लोरोपाइरिफॉस (हिबिकी) 4 लीटर प्रति हेक्टर की दर से 1200-1300 लीटर पानी में घोलकर कूड़ों में बुवाई के बाद टुकड़ों पर हजारे से छिड़कें या 2 मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर बुआई के पहले कुंडों को 10 मिनट डुबाके उपचार करें।

अंकुर बेधक (Early shoot borer)

 

ग्रीष्मकाल

 

शिज़ैन (फिप्रोनिल 0.3 GR) @ 10-13 किलो प्रति एकड़ की दर से डालें या शिन्ज़ेन प्लस (फिप्रोनिल 5 SC) @ 600 -800  मिली 200 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।

क्लोरोपाइरिफॉस (हिबिकी) 4 लीटर प्रति हेक्टर की दर से 1200-1300 लीटर पानी में घोलकर कूड़ों में बुवाई के बाद टुकड़ों पर हजारे से छिड़कें।

ट्राइकोग्रामा 10 कार्ड प्रति हेक्टेयर  की दर से पत्तों पर लगाना चाहिए।

मिटटी चढ़ाना और साथ ही सिंचाई देना।

चोटी बेधक (Top shoot borer)

मार्च से अक्टूबर

 

ग्रीष्मकाल में प्रभावित किल्लों और बेधक के अंडसमूह को निकालना तथा नष्ट करना। 

ट्राइकोग्रामा 10 कार्ड प्रति हे0 की दर सेप्रयोग करना चाहिए। 

 कार्बोफ्यूरान 3 जी. का 30 किग्रा. प्रति हे. की दर से नमी की दशा में प्रयोग करना।

तना बेधक (Stem Borer) 

अगस्त से फरवरी

मोनोक्रोटोफास 36% 2.00 ली./हे. दवा को 800-1000 लीटर पानी में मिलाकर अगस्त से अक्टूबर तक तीन सप्ताह के अंतर पर तीन बार छिड़काव करना।

सफ़ेद सुण्डी

 

ग्रीष्मकाल

 

रेतीली मिट्टी में जड़ सुण्डी के कारण नुकसान गंभीर प्रतीत होता है।

शिरसगी (फिप्रोनिल 40 + इमिडाक्लोप्रिड 40  WG) @ 180 -200  ग्राम  400 -500 लीटर पानी में घोलकर ड्रेंचिंग करें

रोपण के समय मिट्टी में कार्बोफ्यूरान दानों का @ 30 किलोग्राम / हेक्टेयर का अनुप्रयोग क्षति को कम करता है।

खड़ी फसल पर, 2-3 दिनों के लिए खेतों की बाढ़ करें ताकि गंभीरता को कम करने में प्रभावी हो ।

वूली एफिड (वूली माहू)

ग्रीष्मकाल

 

•  पड़ी के फसल में इसका प्रकोप ज्यादा हो तो पड़ी फसल न ले

• द्वी पंकित / व्यापक पंक्ति रोपण को अपनाना।

• प्रभावित पत्तियों को निकालना और जलाना।

• गन्ने की पत्तों को लपेट और प्रॉपिंग करें।

तोमाडाची (एसेफेट 75 एसपी) @ 1 ग्राम / लीटर के साथ या डिमेथोएटे 30 EC @ 1.7  मिली प्रति लीटर पानी में घोलकर अप्सरा अवस्था में छिड़काव करें।

मिली बग

 

 

• मिली बग के साथ संक्रमित पौधे की फसल को संसाधित नहीं किया जाना चाहिए।

• नत्रजन उर्वरकों की अधिक खुराक से बचें।

• मिली बग का प्रचलित क्षेत्रों में पड़ी फसल ना ले

• उगाई गई फसल में कटाई की वकालत की जाती है, इसके बाद डाइमेथोएट @ 1.7 मिली / ली या मैलाथियान @ 3 मिली / ली का पूरी तरह छिड़काव किया जाता है। लंबी लांस के साथ पैर स्प्रेयर का उपयोग करके।

पायरिला (Pyrilla)

मार्च से नवम्बर

क्लोरोपाइरिफॉस (हिबिकी)50 EC- 240 मिली 400 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें ।

काला चिकटा (Black bug)

ग्रीष्मकाल

 

डाईक्लोरवाम 76 ई.सी.100 मिली. या क्वीनालफास 25% 320 मिली. /एकड़ 400 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।

सफेद मक्खी (White fly)

 

अगस्त

मैलाथियान 50% 1 ली. दवा को 1250 लीटर पानी में मिलाकर घोल का छिड़काव करना।

 

नोट : चोटी बेधक, अंकुर बेधक, गन्ना बेधक आदि बेधक कीटों की रोकथाम हेतु ट्राइकोग्रामा अण्ड परजीवी के 50,000 अण्डे प्रति हे. की दर से बुवाई के एक महीना बाद से प्रारम्भ करके 5-6 बार खेत में 10 दिन के अन्तराल पर छोड़ने चाहिये।इसके लिए अण्डे लगे कार्ड ट्राइकोकार्ड को टुकड़ों के काटकर पत्तियों की निचली सतह पर लगाने चाहिये।

कटाई : जैसे ही हैण्ड रिफ्रेक्टोमीटर (दस्ती आर्वतन मापी) का बिन्दु 18 पहुँचे गन्ने की कटाई शुरू कर देनी चाहिए। यंत्र के अभाव में गन्ने की मिठास से भी गन्ने के पकने का पता लगाया जा सकता है।

कटाई उपरांत गन्ना अवशेष प्रबंधन: 

  • कटाई उपरांत सर्वप्रथम गन्ने के अवशेषी कूड़े-करकट को एकत्र करके एकांतर क्यारियों में व्यवस्थित करें।
  • गन्ने के अवशेष टुकड़े अथवा जड़ों को मृदा के एकदम समीप से काट दें।
  • 250 मि.ली. कार्बेन्डाजिम व 250 मि.ली. क्लोरपायरीफॉस का 100 लीटर पानी में घोल तैयार करें व उसका अवशेषी कूड़े-करकट पर छिड़काव करें।
  • खेत की सिंचाई कर दें, ताकि अवशेषी कूड़ा-करकट पर्याप्त नमी अवशोषित कर सके। 
  • 200 लीटर पानी लेकर उसमें 2 कि.ग्रा. गुड़  का घोल तैयार करें। उसमें विघटनकारी कल्चर (इफको बायोडिकंप्सेर) एक बोतल की मात्रा को मिलाएं, इस मिश्रण को अच्छी तरह से घोल बनाकर कपड़े से ढक दें।
  • इस मिश्रण को रोजाना 5-6 दिन मिलाना चाहिए।
  • तैयार मिश्रण के विघटन के पश्चात इसका अवशेषी कूड़े-करकट पर छिड़काव कर दें।

 

                                         पेड़ी प्रबन्धन : 

हमारे प्रदेश की गन्ना उत्पादकता देश के अन्य प्रदेशों की अपेक्षा कम है जिसका मुख्य कारण किसानों द्वारा गन्ना पेड़ी की उचित प्रबन्धन न करना है जबकि पेड़ी फसल बावग (बोयी गयी) फसल से ज्यादा महत्वपूर्ण है। उन्नत कृषि प्रबन्धन कर गन्ने की उत्पादकता बढ़ायी जा सकती है। पेड़ी की एक फसल लेना आर्थिक दृष्टि से अच्छा रहता है। ध्यान रहे कि पेड़ी रखने के लिये वही किस्म बोयें जिनकी पेड़ी अच्छी रहती है।

उन्नत प्रजातियाँ : 

1. शीघ्र पकने वाली : को.शा. 8436, को.शा 88230, कोशा 95255, को.शा. 687, को. से. 1235, को.पन्त 842111

2. मध्य देर से पकने वाली : को.शा. 96275, को.शा. 8432, को शा. 8439, को,शा. 87222, को.शा. 787, को.शा. 8021

कटाई का उचित समय : नवम्बर से जनवरी तापक्रम कम होने के कारण काटे गये बावग गन्ने में फुटाव कम होता है। फलस्वरूप उसकी पेड़ी अच्छी नहीं होती है। अतः पेड़ी से अधिक उत्पादन लेने हेतु बावग गन्ने की कटाई मध्य जनवरी से मार्च तक करनी चाहिए।

कटाई की उचित विधि : कटाई करने से पहले मेड़े समतल करके गन्ने की कटाई तेज धार वाले हथियार से जमीन की सतह से करनी चाहिए। ऐसा न करने पर अंकुर पेड़ के ऊपर निकलने के कारण पैदावार कम होगी यदि समय से गन्ने की कटाई कर रहे हो तो जल किल्लों को काट देना चाहिए तथा देर से कटाई करने पर जल किल्लों को छोड़ना लाभदायक रहता है।

सिंचाई : गन्ने की कटाई के बाद जल्दी से सिंचाई कर देनी चाहिए। इसके बाद 20-25 दिन के अन्तर पर सिंचाई करें। यदि वर्षात के समय 20-25 दिन तक वर्षा न हो तो सिंचाई अवश्य करनी चाहिए।

कर्षण क्रियाएं : गन्ने की कटाई व सिंचाई के तुरन्त बाद टूटों की छटाई अवश्य करें। यदि गन्ने के दो थानों के बीच 45 से.मी. या इससे अधिक स्थान खाली हो तो 25-30 दिन की तैयार नर्सरी या पालीवैग सैटलिंग से रिक्त स्थानों की भराई 15 अप्रैल तक जरूर कर दें। खरपतवार नियंत्रण के लिए सिंचाई के बाद निराई-गुड़ाई करते रहें। गिरने से बचाने हेतु मिट्टी चढ़ाये व बँधाई कर देनी चाहिए।

सूखी पत्ती बिछाना (मल्चिंग) : सीमित सिंचाई उपलब्ध होने तथा खरपतवारों के नियंत्रण हेतु पेड़ी गन्ना की दो पंक्तियों के बीच सूखी पत्तियों की 7.5 से.मी. मोटी तह बिछाने से नमी संरक्षण एवं खरपतवारों का भी नियंत्रण होता है तथा वर्षाकाल में यही पत्ती सड़कर जैविक पदार्थ की मात्रा को बढ़ाकर खेत की उर्वरा शक्ति में वृद्धि करती है। 

उर्वरकों का प्रयोग : सामान्यतया मृदा परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। 10 से 12 टन कम्पोस्ट की खाद डालना भी आवश्यक है। पड़ी में गन्ने की बावग फसल की अपेक्षा 20 प्रतिशत अधिक नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है क्योंकि पेड़ी गन्ने की जड़ों की अवशोषण क्षमता कम होती है तथा गन्ने के अवशेषों को सड़ाने हेतु सूक्ष्म जीवों को अतिरिक्त नत्रजन की आवश्यकता पड़ती है। अतः 180 कि.ग्रा. नत्रजन प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा कटाई व सिंचाई के बाद उचित नमी पर लाइनों में टाप ड्रेसिंग करें तथा शेष आधी नत्रजन मई माह तक अवश्य दे देनी चाहिए।

 

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Ritika Arora

01, Aug 2020 04:59:21PM

Nice

215554340011 cscuser

02, Aug 2020 11:12:12AM

lal sadan (red rote ) ki roktham ke liye kya dwa use kare

Upendra singh

15, Jul 2020 12:17:55PM

not

munendra pal

28, Jul 2020 08:08:18PM

very good product

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