cURL Error #:Operation timed out after 30001 milliseconds with 0 bytes received चर्चा का मंच | Charcha
user-img

मूंग की खेती

Sunit Goyal
(Agri Expert), Jul 01 , 2020 07:06:10PMArticle by expert

 

जलवायु: मूंग की फसल हर प्रकार के मौसम में उगाई जा सकती है। ऐसे क्षेत्र जहां 60 से 75 सें.मी. वर्षा होती है, मूंग के लिए उपयुक्त होते हैं। फली बनते तथा पकते समय वर्षा होने से दाने सड़ जाते हैं और काफी हानि होती है। उत्तरी भारत में मूंग को वसंत ऋतु (जायद) में भी उगाते हैं। अच्छे अंकुरण एवं समुचित बढ़वार हेतु क्रमषः 25 डिग्री एवं 20 से 40 डिग्री से. तापमान उपयुक्त होता है।

मृदा: मूंग की खेती के लिए दुमट मृदा सबसे अधिक उपयुक्त होती है। इसकी खेती मटियार और बलुई दुमट मृदा में भी की जा सकती है लेकिन उसमें उत्तम जल-निकास का होना आवश्यक है।

संस्तुत प्रजातियाँ

क्र. सं.

प्रजातियां

पकने की अवधि (दिन)

औसत उपज (क्विं./ है.)

विशिष्ट गुण औसत

1.

एम एच 421

60-62

-

पीला मोजैक रोधी, फलियों के फटने के प्रति प्रतिरोधक, चमकीला हरा दाना

2.

पूसा विशाल

60-62

10-12

पीला मोजैक रोधी तथा एक साथ पकने वाली प्रजाति

3.

पूसा 9531

65-70

10-12

पीला मोजैक रोधी, चमकीला हरा दाना

4.

पूसा रतना

65-70

10-12

पीला मोजैक रोधी प्रजाति

5.

पूसा 0672

70-72

9-10

पीला मोजैक रोधी, चमकीला तथा मध्यम आकार का हरा दाना

6.

सम्राट

58-62

10-12

पीला मोजैक रोधी, चमकीला हरा दाना तथा एक साथ पकने वाली प्रजाति

7.

मेहा

65-70

12-14

पीला मोजैक रोधी, चमकीला हरा दाना

8.

आर.एम.जी. 268

66-73

8-10

पीला मोजैक रोधी, चमकीला हरा दाना

9.

पंत मूंग 4

65-70

12-14

पीला मोजैक रोधी, हल्का हरा दाना

10.

पंत मूंग 5

60-65

12-14

पीला मोजैक रोधी, सभी ऋतुओं के लिए उपयुक्त

11.

पंत मूंग 6

60-65

12-14

पीला मोजैक रोधी

12.

एस.एम.एल. 668

60-62

10-12

पीला मोजैक रोधी, बड़ा हरा दाना

13.

एस.एम.एल. 832

60-62

11-60

पीला मोजैक व श्रिप्स रोधी, मध्यम आकार व चमकीला दाना

14.

एच.यू.एम. 2

60-65

11-12

पीला मोजैक रोधी, सभी ऋतुओं के लिए उपयुक्त

15.

एच.यू.एम. 1

60-65

9-11

पीला मोजैक रोधी

16.

एच.यू.एम. 6

68-70

10-11

पीला मोजैक रोधी

17.

एच.यू.एम. 12

60-65

8-10

पीला मोजैक रोधी

18.

गंगा 8

72-75

9-10

पीला मोजैक रोधी

19.

आर.एम.जी. 492

65-70

9-11

पीला मोजैक रोधी

20.

एम.एल. 818

75-80

10-12

पीला मोजैक रोधी

21.

टी.एम.बी. 37

65-70

12-14

पीला मोजैक रोधी, चमकीला तथा बड़ा हरा दाना

22.

एच.यू.एम. 16

60-65

10-12

पीला मोजैक रोधी, चमकीला तथा बड़ा हरा दाना

23.

बसंती (एम.एच.125)

65-70

10-12

पीला मोजैक रोधी

24.

आई.पी.एम. 02-14

62-70

10-11

पीत चितेरी रोगरोधी, बड़ा, चमकीला तथा आकर्षक हरा दाना

खेत की तैयारी: ग्रीष्मकालीन फसल को बोने के लिए गेहूं को खेत से काट लेने के बाद केवल सिंचाई करके (बिना किसी प्रकार की खेत की तैयारी करके) मूंग बोयी जाती है। परन्तु अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए एक बार हैरो चलाकर जुताई करके पाटा फेर कर खेत तैयार करना ठीक रहता है।

बीज दर:

  1. खरीफ- किस्म के अनुसार 12 से 15 कि .ग्रा. बीज प्रति हेक्टेयर।
  2. बसंत तथा ग्रीष्मकालीन ऋतु- 20 से 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर।

बीज उपचार: फसल को मृदा एवं बीजजनित रोगों से बचाने के लिए और बीजों के अच्छे अंकुरण तथा स्वस्थ पौधों की पर्याप्त संख्या हेतु बीजों को कवकनाशी से बीज उपचार करना चाहिए। इसके लिए प्रति कि.ग्रा. बीज को 2 से 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम सत्सुमा (कार्बेन्डाजिम 50 WP) से उपचार करें।

इसके बाद 500 मि.ली. तरल एन.पी.के. तरल कॉन्सोर्टिया जैव उर्वरक को आवश्यकतानुसार पानी में घोलकर एक एकड़ के लिए पर्याप्त बीज के ढेर पर डालकर हाथों से मिलाएं जिससे बीजों पर जैव उर्वरक समान रूप से मिल जाये। उपचारित बीजों को छाया में सुखाकर यथाशीघ्र ही बुवाई कर दें।

बुवाई:

  1. वर्षा ऋतु- मध्य जुलाई से अगस्त के दूसरे सप्ताह तक
  2. वसंतकालीन- फरवरी के दूसरे पखवाड़े या मार्च में
  3. ग्रीष्मकालीन- गेहूं काटने के तुरंत बाद (15 अप्रैल तक)

खरीफ की फसल को 30 से 35 सें.मी. की दूरी पर पंक्तियों में बोना चाहिए और पौधे से पौधे की दूरी लगभग 7 से 10 सें.मी. होनी चाहिए। बसंत तथा ग्रीष्मकालीन ऋतु की फसल के पौधे की बढ़वार कम होती है। इसलिए 25-30 सें.मी. पंक्ति से पंक्ति की दूरी पर्याप्त है। बोने के लिए सीडड्रिल का प्रयोग किया जा सकता है।

उर्वरक प्रबंधन: सामान्यत: उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर किया जाना चाहिए। 10 से 12 टन प्रति हैक्टर कम्पोस्ट की खाद डालना भी आवश्यक है। मूंग की फसल के लिए 15-20 कि.ग्रा. नाइट्रोजन, 60 कि.ग्रा. फॉस्फोरस, 40 कि.ग्रा. पोटाश एवं 20 कि.ग्रा. सल्फर प्रति हैक्टर की जरुरत होती है जिसके लिए 190 किग्रा. एन.पी.के. (12:32:16) के साथ 23 किग्रा. सल्फर बेंटोनाइट प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के समय कूड़ों में प्रयोग करें। कुछ क्षेत्रों में जिंक की कमी की अवस्था में 15-20 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से जिंक सल्फेट का प्रयोग करना चाहिए। फसल के अच्छे प्रारंभिक बढ़वार और जड़ों के विकास के लिए समुंदरी शैवाल से बने पौध विकास प्रोत्साहक सागरिका Z++ @ 8-10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से बुवाई के समय जरूर डालें। इसके साथ सागरिका तरल का 250 मिली प्रति एकड़ की दर से 100 लीटर में घोल बनाकर फूल आने से पहले, फूल आने के बाद और दाने बनते समय 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें।

सिंचाई प्रबंधन: ग्रीष्म व बसंत कालीन मूंग की फसल को 4 से 5 सिंचाइयां देना आवश्यक होता है। प्रथम सिंचाई बुवाई के 20 से 25 दिन बाद व अन्य सिंचाई 12 से 15 दिन के अंतर पर करें। वर्षा ऋतु की फसल की आवश्यकता अनुसार सिंचाई करें। वर्षा ऋतु की मूंग में उचित जल-निकास की व्यवस्था आवश्यक है। फूल आने से पहले तथा दाना पड़ते समय सिंचाई आवश्यक है। सिंचाई क्यारी बनाकर करना चाहिए।

खरपतवार प्रबंधन: बुआई के प्रारंभिक 4-5 सप्ताह तक खरपतवार की समस्या अधिक रहती है। बोने के बाद 35-40 दिन के भीतर खरपतवारों की सघनता के अनुसार एक या दो बार निराई-गुड़ाई करें। बुवाई के तुरंत बाद 2 कि. ग्रा./हेक्टेयर लासो का 1000 लीटर पानी में घोल बनाकर भूमि पर छिड़क देने से खरपतवारों का काफी समय के लिए नियंत्रण हो जाता है।

कीट प्रबंधन

मूंग में गैर रसायनक कीट प्रबंधन के खेत एवं आस पास की मेडों, पानी की नालियों इत्यादि में खरपतवारों का उचित प्रबंधन करना चाहिए। समय पर सिंचाई करें। मूंग की कीट अवरोधी प्रजातियाँ उगानी चाहिए। जैविक खेती में फफूंद जनित रोगों के नियंत्रण के लिए ट्राइको पावर+ @ 6-10 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से बीजोपचार करें। कीटों के नियंत्रण हेतु नीम से समृद्ध जैव कीटनाशक एज़ा पावर + @ 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। यह कीटनाशक जैविक खेती में कीटों और फफूंद जनित रोगों को रोकने के लिए उपयोगी है। 

  1. सफेद मक्खी और माहुं:- सफेद मक्खी और माहुं के शिशु एवं बालग पत्तियों एवं फूलों से रस चूसते हैं। यह कीट पत्तों पर हनीडिउ उत्सर्जित करते हैं, जिससे पत्तों पर एक काली परत बन जाती है जिसके परिणामस्वरूप प्रकाश संश्लेषण किरिया में विघ्न पड़ता है। अगर हमला गंभीर हो तो पत्तियां सूख जाती हैं और फसल खराब हो जाती है। सफेद मक्खी पीले मोज़ेक वायरस को भी फैलाती है। सफेद मक्खी के नियंत्रण के लिए रोगर (डाइमोथोएट 30 ई.सी.) @ 1.7 मिली/ लीटर पानी में घोल बनाकर फसल पर छिड़काव करें। माहुं के नियंत्रण के लिए एज़ा पावर + @ 5 मिली /लीटर पानी या रोगर (डाइमेथोएट ३० ई.सी.) @ 1.7 मि.ली./लीटर पानी या इसोगाशी (इमिडाक्लोप्रीड 17.8 एस.एल.) @ 0.2 मिली/ प्रति लीटर पानी का फसल पर छिड़काव करें।
  2. जैसिड (हरा फुदका):- जैसिड के शिशु एवं बालग पत्तियों से चूसते हैं जिसके कारण पत्तियां पीली और सूखने लगती हैं।
  3. थ्रिप्स:- इस कीट के शिशु एवं प्रौढ़ दोनों पत्तियों एवं फूलों से रस चूसते है। भारी प्रकोप होने पर पत्तियों से रस चूसने के कारण वे मुड़ जाती हैं तथा फूल गिर जाते है जिससे उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • हरा फुदका और थ्रिप्स के नियंत्रण के लिए फोरेट-10 जी @ 10 किग्रा अथवा कार्बोफ्यूरान-3 जी @ 20 किग्रा. प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के समय डालें। इसके अलावा मेटासिस्टोक्स (मिथाइल-ओ-डिमेटान 25% ई.सी.) या रोगर (डायमिथोएट 30% ई.सी.) @ 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600-800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
  1. फफोला भृंग (ब्लिस्टर बीटल): यह बहुभक्षी कीट लगभग पूरे देश में मूंग की फसल को हानि पहुंचाता है। इसके वयस्क फूलों को चट कर जाते हैं और उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। रात्रि में प्रकाश पाश का प्रयोग करके इस कीट के प्रजनन को कम किया जा सकता है। इसके अलावा दस्ताने पहनकर कीटों को खेत में एकत्रित किया जा सकता टोमोडाची (एसीफेट 75 एस.पी.) @ 1.0 ग्राम/लीटर पानी या मेथोमाइल 40 एस.पी. @ 0.6 ग्राम/लीटर पानी या ऐकालक्स (क्यूनालफॉस 25 ई.सी.) @ 2.0 मि.ली./ लीटर पानी की दर से फसल पर छिड़काव करें।
  2. फली छेदक:- इसकी सूंडी फली में छेद कर उसका अंदर का गूदा खा जाती है।  इगाओ (इमामेक्टिन बेन्जोयेट 5% एस.जी.) 250 ग्राम प्रति हेक्टेयर 1000 लीटर पानी में घोलकर फली बनते समय और पहले छिड़काव के 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें।

रोग प्रबंधन

  1. सर्कोस्पोरा लीफ स्पॉट: सरकोस्पोरा के कारण पत्तियों पर भूरे गहरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं जिनका बाहरी किनारा गहरे से भूरे लाल रंग का होता है। अनुकूल परिस्थतियों में यह धब्बे बड़े आकार के हो जाते हैं और अन्ततः रोगग्रसित पत्तियाँ गिर जाती हैं। अधिक धब्बे बनने के कारण फलियों का रंग काला पड़ जाता है और तनों पर बड़े आकार की चित्तियां बन जाती हैं। बुवाई से पहले बीज को कैप्टान या थीरम नामक कवकनाशी से (2.5 ग्रा. /कि.ग्रा. बीज की दर से) शोधित करें। फसल पर रोग के प्रारम्भिक लक्षण दिखते ही कवकनाशी यामाटो (कार्बेन्डाजिम 50 WP) का 5 ग्राम प्रति 10 लीटर या सतसुमा (मेंन्कोजेब 75 WP) 25 ग्राम प्रति 10 लीटर की दर से एक से दो बार छिड़काव 10-15 दिन के अन्तराल पर करें।
  2. पीला मोजैक: इस रोग के प्रारंभिक लक्षण पत्तियों पर पीले धब्बे के रुप में दिखायी पड़ते हैं जो आपस में एक साथ मिलकर, तेजी से फैलकर पत्तियों पर बड़े-बड़े धब्बे बनाते हैं। अन्ततः पत्तियाँ पूर्ण रुप से पीली हो जाती हैं। ऐसे पौधों में फूल और फलियाँ बहुत कम लगती हैं। पत्तियों के साथ-साथ फलियों तथा दानों पर पीले धब्बे बन जाते हैं। यह रोग सफेद मक्खी द्वारा फैलता है। इसलिए यह रोगवाहक सफेद मक्खी की रोकथाम से नियंत्रित हो सकता है। खेत में जैसे ही रोगी पौधे दिखाई दें, थायामेथाक्साम (तायो) या इमिडाक्लोपि्रड (इसोगाशी) 0.02 प्रतिशत का प्रति हेक्टेयर 1000 लीटर में छिड़काव कर दें। छिड़काव को 15-20 दिन के अन्तर पर दोहरायें और कुल 3-4 छिड़काव करें। छिड़काव के 24 घंटे के बाद रोगी पौधे को उखाड़ कर जला देना चाहिए। पीला मोजैक रोग ग्रीष्मकालीन तथा बसंतकालीन फसल में कम तथा वर्षा ऋतु में ज्यादा लगता है। बीज उपचार कीटनाशी रसायन क्रुजर या गऊचो 4 ग्रा. प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से करें।
  3. ऐंथ्राक्नोज (रुक्ष रोग)- इस रोग में पत्तियों पर भूरे रंग के गोल धंसे हुए धब्बे बन जाते हैं। अनुकूल वातावरण में पत्तियों के संक्रमित भाग (धब्बे) झड़ जाते हैं जिसके फलस्वरुप पत्तियों में सुराख हो जाते हैं जिसका प्रभाव पौधे की पैदावार पर पड़ता है। रोग के प्रबंधन के लिए प्रमाणित बीज का प्रयोग करें। बीजों को धीरम अथवा कैप्टान द्वारा 2-3 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज अथवा सतसुमा (कार्बेन्डाजिम 50 WP) 2 ग्राम प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें। रोग के लक्षण दिखते ही 0.2 प्रतिशत जिनेब अथवा थिरम का छिड़काव करें। आवयकतानुसार 15 दिन के अन्तराल पर अतिरिक्त्त छिड़काव करें। या कार्बेन्डाजिम (सतसुमा) या मैंकोजेब (यामाटो) 0.2 प्रतिशत का छिड़काव भी कर सकते हैं।

कटाई एवं गहराई

वर्षा ऋतु में जब पौधों की अधिकतर फलियां पक कर काली हो जाती हैं तो फसल काटी जा सकती है। ग्रीष्म तथा बसंतकालीन फसलों में जब 50 प्रतिशत फलियां पक जाएं, फलियों की पहली तुड़ाई कर लेनी चाहिए। इसके बाद दूसरी बार फलियों के पकने पर कटाई की जा सकती है। फलियों को खेत में सूखी अवस्था में अधिक समय तक छोड़ने से वे चटक जाती हैं और दाने बिखर जाते हैं जिससे उपज की हानि होती है। फलियों से बीज को समय पर निकाल दें।

उपज

वर्षा ऋतु की फसल से प्रति हेक्टेयर 10 कविंटल पैदावार मिल जाती है। ग्रीष्मकालीन फसल में समुचित प्रबंध द्वारा 10 से 15 कविंटल तक पैदावार लेना संभव है। साथ ही लगभग 15-20 कविंटल सूखा चारा भी प्राप्त हो जाता है।

3 Likes

0 Comment

Ask questions

Our Agri-Expert Panel

Naveen Kumar Sain
(Agri Expert)

Naveen Kumar Sain
(Agri Expert)

8

Reply

16

Articles

Upendra Kumar
(Agri Expert)

Upendra Kumar
(Agri Expert)

91

Reply

5

Articles

Kolluri Ramu
(Agri Expert)

Kolluri Ramu
(Agri Expert)

0

Reply

0

Articles

Dr. Tarunendu Singh
(Agri Expert)

Dr. Tarunendu Singh
(Agri Expert)

0

Reply

0

Articles

Sunit Goyal
(Agri Expert)

Sunit Goyal
(Agri Expert)

449

Reply

2

Articles

Hima Shankar K R
(Agri Expert)

Hima Shankar K R
(Agri Expert)

746

Reply

4

Articles

Popular Articles by experts

गन्ने की खेती

Posted by Hima Shankar K R
(Agri Expert) on 07-Jul-2020

बाजरा की उन्नत खेती

Posted by Hima Shankar K R
(Agri Expert) on 03-Jul-2020

मूंग की खेती

Posted by Sunit Goyal
(Agri Expert) on 01-Jul-2020